वर दे, वीणावादिनि वर दे।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव,
भारत में भर दे।
वीणावादिनि वर दे ॥
काट अंध उर के बंधन स्तर,
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर,
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर,
जगमग जग कर दे।
वर दे, वीणावादिनि वर दे ॥
नव गति, नव लय, ताल छंद नव,
नवल कंठ, नव जलद मंद्र रव,
नव नभ के नव विहग वृंद को,
नव पर नव स्वर दे।
वर दे, वीणावादिनि वर दे ॥
वर दे, वीणावादिनि वर दे।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव,
भारत में भर दे।
वीणावादिनि वर दे ॥
रचनाकार: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
वर दे, वीणा वादिनि वर दे – सरस्वती वंदना
“वर दे, वीणा वादिनि वर दे” महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित एक प्रसिद्ध सरस्वती वंदना है। यह केवल देवी सरस्वती की स्तुति नहीं, बल्कि भारतीय चेतना, स्वतंत्र चिंतन और नव निर्माण का आह्वान है। इस वंदना में माँ सरस्वती को वीणावादिनी, प्रकाश की धारा बहाने वाली और अज्ञान के बंधनों को काटने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है।
कविता में माँ से यह प्रार्थना की गई है कि वे हृदय के अंधकार को दूर करें, नवीन स्वर, नवीन लय और नवीन चेतना प्रदान करें, ताकि भारत ज्ञान, कला और संस्कृति में पुनः जगमगा उठे। यह वंदना विशेष रूप से विद्यार्थियों, साहित्य-प्रेमियों, कलाकारों और राष्ट्र-चिंतन से जुड़े साधकों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है।
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वर दे, वीणा वादिनि वर दे – एक ओजस्वी और प्रेरणादायक सरस्वती वंदना है, जिसमें कवि माँ शारदे से ज्ञान, प्रकाश, नवीन चेतना और राष्ट्र के उत्थान का वरदान माँगता है।
यह सरस्वती वंदना ज्ञान, स्वतंत्रता, सृजन और राष्ट्रीय चेतना का अद्भुत संगम है, जो मन को प्रेरणा से भर देती है और आत्मा को प्रकाश की ओर ले जाती है। 🙏 जय माँ सरस्वती
