जय जय भैरवी असुर भयाउनि माँ काली भजन के बोल (Lyrics – Hindi)
जय जय भैरवी असुर भयाउनि
पशुपति भामिनि माया।
सहज सुमति वर दिऔ हे गोसाउनि
अनुगति गति तुअ पाया।।
वासर रैनि सबासन शोभित
चरण चन्द्रमणि चूड़ा।
कतओक दैत्य मारि मुख मेलल
कतओ उगिलि कएल कूड़ा।।
सामर बरन नयन अनुरंजित
जलद जोग फुलकोका।
कट-कट विकट ओठ पुट पांडरि
लिधुर फेन उठ फोंका।।
घन-घन-घनन घुँघरू कत बाजय
हन-हन कर तुअ काता।
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक
पुत्र बिसरू जनि माता।।
जय जय भैरवी असुर भयाउनि भजन में माँ काली के भय नाशक और कल्याणकारी रूप का स्तवन किया गया है। भक्त माँ से सहज़ बुद्धि, पवित्र मन और सद्गति का वरदान माँगता है, ताकि वह देवी की कृपा से मोक्ष पथ को प्राप्त कर सके। यह भजन शक्ति, भक्ति और तांत्रिक भावनाओं का गहन संगम प्रस्तुत करता है।
इस भजन में माँ के रौद्र स्वरूप का सजीव चित्रण है—श्मशान में विराजमान देवी, असुरों का संहार, रक्तरंजित मुख, घुँघरुओं की गर्जना और तलवार की तीव्र गति। साथ ही इसमें यह भी भाव व्यक्त होता है कि यह उग्रता केवल अधर्म के विनाश हेतु है, जबकि भक्तों के लिए माँ पूर्ण करुणा और संरक्षण का स्वरूप हैं।
भजन के अंतिम पद में कवि विद्यापति स्वयं को माँ का पुत्र बताते हुए उनसे कभी न भूलने की विनती करते हैं। यही मातृत्व भाव, उग्रता और वात्सल्य का संतुलन इस भजन को आध्यात्मिक रूप से अत्यंत गहन और प्रभावशाली बनाता है।
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जय जय भैरवी असुर भयाउनि माँ काली भजन से जुड़ी विशेष जानकारी
श्रेणी: माँ काली / शक्ति भजन
भाव: उग्र भक्ति, शरणागति, शक्ति उपासना
देवी स्वरूप: माँ काली (भैरवी)
रचनाकार: महाकवि विद्यापति
भाषा: मैथिली
यह भजन माँ काली की अपार शक्ति, उनके भय नाशक स्वरूप और भक्तों पर बरसने वाली ममता का प्रतीक है। इसे सुनकर और पढ़कर साधक के भीतर साहस, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का संचार होता है। 🙏 जय माँ काली


