मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो लिरिक्स (Mujhe Shyam Sunder ki dulhan bana do lyrics in hindi)

मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो: यह भजन पूज्य संत माँ ब्रज देवी जी द्वारा रचित है और इसमें जीवात्मा की परमात्मा से मिलने की तीव्र लालसा को दुल्हन और दूल्हे के मिलन के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। इसमें भक्त आत्मा अपने जीवन के अस्थायी रिश्तों को त्यागकर केवल शाश्वत, अचल और अविनाशी वर यानी श्री श्यामसुंदर को पाने की प्रार्थना करती है। जैसे दुल्हन अपने विवाह में सजधज कर दूल्हे से मिलती है, वैसे ही भक्त अपने जीवन को भक्ति, श्रद्धा और प्रेम से सजाकर प्रभु से मिलन की कामना करता है।

मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो लिरिक्स

मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो लिरिक्स

(दोहा: ऐसे वर को क्या वरु, जो जनमे और मर जाये,
वरीये गिरिधर लाल को, चुड़लो अमर हो जाये)

आओ मेरी सखियो, मुझे मेहँदी लगा दो,
मेहँदी लगा दो, मुझे सुन्दर सजा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ।।

सतसंग मे मेरी बात चलायी,
सतगुरु ने मेरी किनी सगाई,
उनको बुला के हथलेवा तो करा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ।।

ऐसी पेहनु चूड़ी जो कबहू ना टूटे,
ऐसा वरु दूल्हा जो कबहू ना छूटे,
अचल सुहाग की बिंदिया लगा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ।।

ऐसी ओढु चुनरी जो रंग नहीं छूटे,
प्रीत का धागा कभी नहीं टूटे,
आज मेरी मोतियों से मांग भरा दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ।।

प्रीत की पायल पहन नाच नाच गाउंगी,
अविनाशी प्रीतम से ब्याह में रचाऊँगी,
मुझे मेरे मोहन से कोई तो मिला दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ।।

भक्ति का सुरमा मैं आँख मे लगाउंगी,
दुनिया से नाता तोड़ मैं उनही की हो जाउंगी,
सतगुरु बुला के मेरे फेरे तो डला दो,
मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो ।।

लिरिक्स – पूज्य संत माँ ब्रज देवी जी

क्यों पढ़ें यह भजन? – मुझे श्याम सुन्दर की दुल्हन बना दो लिरिक्स 
यह भजन हमें सिखाता है कि सांसारिक रिश्ते और सुख अस्थायी हैं, परंतु प्रभु के साथ जुड़ा रिश्ता अमर और अविनाशी होता है। इसे पढ़ने या गाने से हृदय में भक्ति का भाव प्रबल होता है, मोह-माया से दूरी बनती है और आत्मा को परमात्मा से मिलने की प्रेरणा मिलती है। यह भजन हर उस इंसान को आंतरिक शांति और संतोष देता है जो प्रभु को अपना जीवनसाथी मानकर उनसे गहरा संबंध जोड़ना चाहता है।

कब पढ़ें यह भजन?

  • प्रातःकाल या संध्या की भक्ति साधना के समय।

  • भजन संध्या, सत्संग या संकीर्तन में।

  • जब मन सांसारिक मोह-माया से ऊबा हुआ और प्रभु से मिलन की लालसा हो।

  • विशेष पर्वों, विवाह-समारोहों या धार्मिक अवसरों पर, जब जीवन के रिश्तों को प्रभु से जोड़कर देखने का भाव हो।

यह भजन भक्त को यह स्मरण कराता है कि सबसे सच्चा और अटूट बंधन केवल प्रभु का है, और उसी को जीवन का परम लक्ष्य बनाना चाहिए।

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